कहाँ का इश्क़ ? कहाँ की वफ़ा ? कहाँ की मोहब्बत ,
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अरे साहिब वो लोग भी गुज़र गए , वो दौर भी गुज़र गया .........Hari Rajpoot
पिंजरे में क़ैद परिंदों को देखा है कभी ,
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ऐसे ही सिसकते हैं मोहब्बत के मरीज़ अक्सर ......... Hari Rajpoot
इंसान की फ़ितरत को क्या ख़ूब समझते हैं परिंदे भी ,
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कितना भी प्यार से बुलाओ मगर पास नहीं आते .......Hari Rajpoot
ना शौक़ -ए -दीदार , ना फ़िकर -ए -जुदाई
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कितने ख़ुशनसीब हैं जो मोहब्बत नहीं करते ....... Hari Rajpoot
क्या यही है क़माल इश्क़ का ,
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उमर जीने की और शौक़ मरने के ....... Hari Rajpoot
इतने संगदिल न बनो कुछ तो मुरव्वत सीखो ,
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तुम पे मरते हैं तो क्या मार ही डालोगे .......Hari Rajpoot
सलीक़ा हो दर्द समझने का ,
बेवफ़ाई की सारी किताबों में ,
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तुझ जैसी मिसाल नहीं......…Hari Rajpoot